डरा-डरा सा रहता मन



आजकल मन डरा-डरा सा रहता है,

हर आहट में जैसे कोई खतरा रहता है।

लोगों से मिलने का मन नहीं करता,

भीड़ में भी कोई अकेला सा लगता है।


हर पल एक घबराहट सी दिल में होती है,

कोई खुशी भी अब तो अधूरी सी लगती है।

दिल चाहता है बस रो लूं चुपचाप कहीं,

कहूं किसी से कुछ… पर बोलूं भी नहीं।


तेज़ आवाज़ों से दिल धड़कने लगता है,

भीतर एक अजीब डर पनपने लगता है।

हर खबर में हिंसा, हर मोड़ पर घाव,

समाज का यह कैसा बनता जा रहा प्रभाव?


कभी लगता है भाग जाऊं दूर कहीं,

जहां कोई न हो, कोई आवाज़ नहीं।

बस हों शांति की सांसें और खुला आकाश,

मन को मिले सुकून, हो भीतर प्रकाश।


पूजा गुप्ता _____

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

" सोच का बंधन "

हडिम्बा देवी मंदिर (कुल्लू मनाली)