" सोच का बंधन "





मुझे कोई काम करने से ऐतराज़ नहीं,
झाड़ू उठाऊँ, बर्तन मांजू, या रोटियाँ सेंकूं सही।
मैं थकती नहीं, ना पीछे हटती, 
हिम्मत से हर जिम्मेदारी निभा देती।

पर तुम कहते हो — “तुम लड़की हो,
तुम्हें ही आना चाहिए ये सब कुछ,
तुम्हारे हिस्से की जगह है रसोई,
सपनों की उड़ान है झूठी कुछ।”

यहीं है मेरी आपत्ति,
तुम्हारी इस सोच में संकुचित दृष्टि।
काम छोटा-बड़ा नहीं होता,
पर क्यों ये बंटवारा सिर्फ़ मेरे हिस्से आता?

मैं कर सकती हूँ कलम भी चलाना,
किताबों से भी रिश्ता निभाना।
मैं मैदान में भी उतर सकती हूँ,
हर हार-जीत की क़ीमत समझ सकती हूँ।

मत बाँधो मुझे “लड़की” के दायरे में,
मेरी पहचान है मेरे कर्म के सहारे में।
सोच बदलो, नजरिया साफ़ करो,
बराबरी के पथ पर एक कदम तो बढ़ो।

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