संदेश

जनवरी, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

डरा-डरा सा रहता मन

चित्र
आजकल मन डरा-डरा सा रहता है, हर आहट में जैसे कोई खतरा रहता है। लोगों से मिलने का मन नहीं करता, भीड़ में भी कोई अकेला सा लगता है। हर पल एक घबराहट सी दिल में होती है, कोई खुशी भी अब तो अधूरी सी लगती है। दिल चाहता है बस रो लूं चुपचाप कहीं, कहूं किसी से कुछ… पर बोलूं भी नहीं। तेज़ आवाज़ों से दिल धड़कने लगता है, भीतर एक अजीब डर पनपने लगता है। हर खबर में हिंसा, हर मोड़ पर घाव, समाज का यह कैसा बनता जा रहा प्रभाव? कभी लगता है भाग जाऊं दूर कहीं, जहां कोई न हो, कोई आवाज़ नहीं। बस हों शांति की सांसें और खुला आकाश, मन को मिले सुकून, हो भीतर प्रकाश। पूजा गुप्ता _____
 आप से तुम तक का सफर और  तुम से तू तक का सफर सिर्फ  कुछ ही लोगों के साथ हुआ  और वो तू भी सिर्फ तुझ तक रहा ||